मेरे दिल की बगिया में खुशियों की बहार आई है,
मुद्दतों बाद आज मेरी मां मेरे घर आई है…
उसके आते ही मुझ में बचपना आ गया
उसकी ममता का घेरा मेरे बदन पर छा गया
वह भी मां थी आज मैं भी मां हूं
बस इसी बात का हौसला अफजाई है
मेरे दिल की बगिया में खुशियों की बहार आई है
मुद्दतों बाद आज मेरी मां मेरे घर आई है
आदत के अनुसार जब मैं अपना घर संवारती हूं,
बारीकियों से जीवन के हर पहलू को निहारती हूं,
बरबस मेरी निगाहें उसकी निगाहों से मिलती है,
तब उसकी बूढ़ी आंखें मुझे देख मुस्कुराती हैं
उसकी सजल आंखों में जाने कितनी गहराई है,
मेरे दिल की बगिया में खुशियों की बहार आई है
मुद्दतों बाद मेरी मां आज मेरे घर आई है
उसने अनपढ़ होने का रोल भले ही निभाया है,
पर ममता, आनंद, प्यार हम पर ही लुटाया है,
आज मैंने उन बातों को महसूस किया है,
मां ने भी जीवन का किरदार बखूबी जिया है,
आज वह मेरा अक्स और मैं उनकी परछाई हूं,
मेरे दिल की बगिया में खुशियों की बहार आई है
मुद्दतों बाद मेरी मां आज मेरे घर आई है।
मेरी दु:ख परेशानियों को देख वह दुखी होती हैं
तब उनके माथे पर चिंता और शिकन होती है,
ऐसे वक्त पर मेरे चेहरे के भाव वह पढ़ लेती हैं ,
स्नेह भरा हाथ रख के दोनों का अंतर बताती है
इस बर्ताव को देख मेरी आंखें डबडबा आई है
मेरे दिल की बगिया में खुशियों की बहार आई है ।
मुद्दतों बाद मेरी मां आज मेरे घर आई है।

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मां तो बस मां होती है, मां तो बस मां होती है।
कभी डांटती थी, कभी फटकारती थी ,
कभी आंचल में छुपा कर दुलारती थी,
क्योंकि-
मां तो बस मां होती है, मां तो बस मां होती है।
सुबह से लेकर शाम तक काम करती नहीं थकती थी,
फिर भी माथे पर एक शिकन तक नहीं दिखती थीं
उसकी हर मुस्कुराहट मुझे एक सबक सिखाती है,
जिंदगी की बेदम सांसों में उम्मीदों के रंग भरती है
उनकी इस महानता पर में गर्व महसूस करती हूं
फिर सोचती हूं कि-
मां तो बस मां होती है ,मां तो बस मां होती है।
सुबह जगाती थी, मुंह थपथपाती थी,
कभी कठोर तो कभी कोमल हो जाती थी,
उसका यह अपनपान मन को लुभा जाता था,
एक पल में ममता का एहसास दिला जाता था,
कोई बात नहीं अगर वह झुंझला जाती थी
फिर मैं सोचती थी कि-
मां तो बस मां होती है, मां तो बस मां होती है।
जब मैं कहती थी आज स्कूल नहीं जाना है
मन नहीं है पढ़ने का और ना ही पढ़ाना है
तब मां बनावटी गुस्सा दिखाती थी
थोड़ा सा खींजती, थोड़ा सा चिल्लाती थी
कहती थी,
कैसे नहीं जाएगी तुझे के पास नहीं होना है
जब दुनिया को तुझे कुछ बनकर नहीं दिखाना है
उसके इस अंदाज से मैं उनसे लिपट जाती थी
क्योंकि-
मां तो बस मां होती है, मां तो बस मां होती है।
मेरी शादी के नए-नए सपने संजोती थी ,
ससुराल में क्या करना है हंस के बताती थी,
कैसे तुझे रहना है मुझको सिखाती थी,
आंखों की कोरों से निकलते हुए आंसू वह मुझसे छुपाती थी,
और फिर ,चेहरे को घुमा कर बहुत जोर से हंसाती थी,
तभी उसका गहरा स्पर्श मेरे अंतर्मन को छू जाता था।
उसकी बाहों के घेरे से मेरा रोम-रोम पुलकित हो जाता था।
फिर मैं सोचती थी !
मां तो बस मां होती है, मां तो बस मां होती है।
वे शुद्ध आत्मा ,आज मैं उनकी छाया हूं,
तूफानों से टकराती चलती फिरती काया हूं,
वह मेरा गरुर थी मैं उनका अरमान हूं ,
वह बीता कल थी मैं उम्मीद का दामन हूं।
सच है-
जीवन के अनेक रूपों को नारी ही जीती है।
खुशियां जगत में बांटकर दुखों को पीती है।
सच्चाई यही है कि मां रूप में वह भगवान होती है।
क्योंकि मां तो बस मां होती है, मां तो बस मां होती है।।